Written By Ashutosh Ojha
Published By: Ashutosh Ojha | Published: Apr 19, 2026, 01:50 PM (IST)
E-Waste
डिजिटल युग ने हमारी जिंदगी को बहुत आसान बना दिया है, लेकिन इसके साथ एक बड़ी समस्या भी बढ़ रही है, जिसे E-Waste (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) कहते हैं। आज के समय में E-Waste बहुत तेजी से बढ़ रहा है और चिंता की बात ये है कि ये जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उतनी तेजी से रीसाइक्लिंग नहीं हो पा रहा। नई-नई टेक्नोलॉजी और हर साल लॉन्च होने वाले नए गैजेट्स की वजह से लोग अपने पुराने फोन, लैपटॉप और दूसरे डिवाइस जल्दी बदल देते हैं। इससे पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामान बेकार होकर कचरे में बदल जाते हैं, जो हमारे पर्यावरण के लिए नुकसानदायक बनता जा रहा है। और पढें: CES 2026 में Samsung का जलवा, C-Lab स्टार्टअप्स ने जीते 17 इनोवेशन अवॉर्ड
E-Waste बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण है लोगों की आदतें और कंपनियों की रणनीति। आजकल लोग जल्दी-जल्दी फोन, लैपटॉप और बाकी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बदलते रहते हैं। कई बार कंपनियां भी ऐसे प्रोडक्ट बनाती हैं जिनकी लाइफ कम होती है, जिससे लोग नया डिवाइस खरीदने पर मजबूर हो जाते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि लाखों टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा लैंडफिल में चला जाता है, जिससे मिट्टी और पानी दोनों प्रदूषित होते हैं।
एक और बड़ी समस्या ये है कि दुनिया में सिर्फ लगभग 22% E-Waste ही सही तरीके से रीसायकल होता है, बाकी का कचरा या तो गलत तरीके से फेंक दिया जाता है या जलाया जाता है, जिससे खतरनाक केमिकल्स निकलते हैं। इससे ना सिर्फ पर्यावरण को नुकसान होता है, बल्कि सोना, तांबा और लिथियम जैसे कीमती संसाधन भी बर्बाद हो जाते हैं, जिन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता था।
इस समस्या को समझते हुए बड़ी टेक कंपनियां अब कदम उठा रही हैं। Apple, Dell और HP जैसी कंपनियों ने ट्रेड-इन प्रोग्राम शुरू किए हैं, जहां ग्राहक अपने पुराने डिवाइस लौटाकर नया खरीदने पर छूट पा सकते हैं। ये कंपनियां रोबोट और ऑटोमेशन का इस्तेमाल करके पुराने डिवाइस को सुरक्षित तरीके से खोलती हैं और उनके पार्ट्स को रीसायकल करती हैं, जिससे रिसोर्स बचते हैं और प्रदूषण कम होता है।
सिर्फ बड़ी कंपनियां ही नहीं, बल्कि नई स्टार्टअप कंपनियां भी इस क्षेत्र में इनोवेशन कर रही हैं। Redwood Materials जैसी कंपनियां बैटरियों से लिथियम और कोबाल्ट जैसे मेटल्स निकालने का काम कर रही हैं। वहीं ReCell, AI की मदद से E-Waste को अलग-अलग कैटेगरी में बांटकर रीसाइक्लिंग को आसान बना रही है। ये नई टेक्नोलॉजी न सिर्फ कचरे को कम करती हैं, बल्कि नए रोजगार के मौके भी पैदा करती हैं।
हालांकि इस समस्या का समाधान सिर्फ कंपनियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। आम लोगों की भी इसमें बड़ी भूमिका है, अगर लोग अपने डिवाइस ज्यादा समय तक इस्तेमाल करें, उन्हें रिपेयर कराएं, सही जगह रीसायकल करें और जरूरतमंदों को डोनेट करें, तो E-Waste काफी हद तक कम किया जा सकता है। सही जानकारी और जागरूकता से हम सभी मिलकर इस समस्या को कंट्रोल कर सकते हैं।
अगर अभी से सही कदम नहीं उठाए गए, तो 2030 तक E-Waste 82 मिलियन टन तक पहुंच सकता है। इसलिए जरूरी है कि कंपनियां, सरकार और आम लोग मिलकर काम करें। टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल, सस्टेनेबल डिजाइन और रीसाइक्लिंग पर ध्यान देकर हम इस संकट को कम कर सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक साफ और सुरक्षित पर्यावरण बना सकते हैं।
E-Waste यानी इलेक्ट्रॉनिक कचरा, जैसे पुराने मोबाइल, लैपटॉप, टीवी। इसमें मौजूद जहरीले केमिकल्स मिट्टी, पानी और हवा को प्रदूषित करते हैं, जिससे पर्यावरण और इंसानों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है।
लोग जल्दी-जल्दी नए गैजेट्स खरीदते हैं और पुराने डिवाइस फेंक देते हैं। साथ ही कंपनियां भी हर साल नए मॉडल लॉन्च करती हैं, जिससे पुराने डिवाइस जल्दी आउटडेटेड हो जाते हैं।
ज्यादातर E-Waste को रीसायकल किया जा सकता है, लेकिन अभी दुनिया में सिर्फ लगभग 20–25% ही सही तरीके से रीसायकल हो पाता है।
कई कंपनियां ट्रेड-इन प्रोग्राम, रीसाइक्लिंग टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन का इस्तेमाल कर रही हैं, जिससे पुराने डिवाइस के पार्ट्स को दोबारा इस्तेमाल किया जा सके।
लोग अपने डिवाइस लंबे समय तक इस्तेमाल करें, रिपेयर करवाएं, जरूरतमंदों को डोनेट करें और सही रीसाइक्लिंग सेंटर पर ही पुराने गैजेट्स जमा करें।