Written By Ashutosh Ojha
Published By: Ashutosh Ojha | Published: May 06, 2026, 11:31 AM (IST)
Climate Smart Agriculture Model
(AI Image)
बिहार के कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव आने वाला है, क्योंकि Rajendra Prasad Central Agricultural University (RPCAU) और Indian Space Research Organisation (ISRO) मिलकर ‘Climate Smart Agriculture Model’ डेवलप करने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य बदलते मौसम और जलवायु संकट के बीच किसानों को ऐसी खेती के तरीके देना है, जिससे प्रोडक्शन बढ़े और पर्यावरण पर नकारात्मक असर कम हो। RPCAU जल्द ही एक ‘Carbon Budget Map’ भी जारी करने जा रहा है, जो राज्य के अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों के अनुसार सबसे बेहतर फसल पैटर्न की पहचान करने में मदद करेगा। यह मैप किसानों के लिए एक गाइड की तरह काम करेगा, जिससे वे समझ पाएंगे कि किस इलाके में कौन-सी फसल सबसे ज्यादा फायदेमंद और पर्यावरण के अनुकूल है।
आज के समय में Climate Change बहुत तेजी से हमारी खेती और खाने की व्यवस्था को बदल रहा है। कभी ज्यादा बारिश, कभी सूखा, तो कभी तापमान में अचानक बदलाव, ये सब खेती को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में ‘Climate-Smart Agriculture’ का मतलब है ऐसी खेती करना, जिससे फसल अच्छी भी हो और पर्यावरण को नुकसान भी कम पहुंचे, यानी किसान ऐसी नई टेक्नोलॉजी और तरीके अपनाएं, जिससे प्रोडक्शन बना रहे, खाने की सुरक्षा (Food Security) बनी रहे और प्रदूषण भी कम हो। इस खेती के तीन मुख्य लक्ष्य हैं…
इसमें आधुनिक टेक्नोलॉजी, सही समय पर सिंचाई, फसल बदल-बदल कर उगाना और कम नुकसान वाली खेती के तरीके शामिल होते हैं, यानी Climate-Smart Agriculture ऐसी समझदारी वाली खेती है, जो किसान और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद है।
इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि इसमें नई टेक्नोलॉजी और तुरंत मिलने वाले डेटा का इस्तेमाल हो रहा है। RPCAU के Vice-Chancellor P.S. Pandey के अनुसार, यूनिवर्सिटी में Eddy Covariance Tower लगाया गया है, जो 24 घंटे लगातार जानकारी रिकॉर्ड करता है, पिछले 4 महीनों से यह टावर किसानों और वैज्ञानिकों को मौसम, कार्बन गैस, पानी की भाप और गर्मी से जुड़ी जरूरी जानकारी दे रहा है। इस जानकारी की मदद से वैज्ञानिक समझ पा रहे हैं कि कौन-सी खेती पर्यावरण के लिए सही है और कौन-सी ज्यादा नुकसान करती है, खासकर धान और गेहूं की खेती में मिले डेटा से यह पता चल रहा है कि किस तरीके से खेती करने पर प्रदूषण (कार्बन) कम किया जा सकता है।
इस टेक्नोलॉजी का फायदा सिर्फ वैज्ञानिकों तक ही नहीं, बल्कि इसे सीधे किसानों तक भी पहुंचाया जा रहा है। समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर के करीब 200 प्रगतिशील किसानों को इस योजना से जोड़ा गया है। इन किसानों को उनके खेत और इलाके के हिसाब से सही सलाह दी जा रही है, जैसे कब पानी देना है, कितनी और कब खाद डालनी है और किस फसल के बाद कौन-सी फसल उगानी चाहिए। इस वैज्ञानिक सलाह का असर अब साफ दिखने लगा है। जिन खेतों में यह तरीका अपनाया गया है, वहां पानी का इस्तेमाल लगभग 25% तक बेहतर हो गया है। इससे किसानों का खर्च कम हो रहा है और पानी की भी बचत हो रही है।
पर्यावरण के हिसाब से भी इस रिसर्च के नतीजे बहुत जरूरी हैं। RPCAU के रिसर्च डायरेक्टर A. K. Singh के अनुसार, जिन खेतों में Zero Tillage (बिना जुताई वाली खेती) और फसल के बचे हुए हिस्सों का सही इस्तेमाल किया जाता है, वहां पुरानी खेती के मुकाबले करीब 30% कम कार्बन गैस निकलती है। इसके अलावा, अगर फसल बदल-बदल कर उगाई जाए और उसमें दाल वाली फसलें (जैसे चना, मसूर) शामिल की जाएं, तो मिट्टी में कार्बन जमा करने की क्षमता 18 से 22% तक बढ़ जाती है। इससे मिट्टी ज्यादा उपजाऊ बनती है और जलवायु परिवर्तन का असर भी कम होता है। एक और दिलचस्प बात यह है कि लीची और आम के बागान हर हेक्टेयर में लगभग 3.2 टन कार्बन अपने अंदर सोख लेते हैं। इससे किसानों को ‘कार्बन क्रेडिट’ के जरिए अतिरिक्त कमाई का मौका भी मिल सकता है।
इस योजना को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए RPCAU, कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs) के जरिए किसानों को लगातार जानकारी दे रहा है। हर हफ्ते मौसम और खेती से जुड़ी जानकारी दी जाती है, जैसे तापमान कितना है, हवा में नमी कितनी है, पानी कितनी तेजी से सूख रहा है और कार्बन से जुड़ी जानकारी। इससे किसान सही समय पर सही फैसले ले पाते हैं, विश्वविद्यालय का लक्ष्य है कि अगले एक साल में बिहार के लिए एक पूरा ‘क्लाइमेट-रेजिलिएंट फसल कैलेंडर’ तैयार किया जाए। यह एक गाइड की तरह होगा, जिससे किसानों को पता चलेगा कि कब कौन-सी फसल लगानी है और कैसे खेती करनी है। अगर यह मॉडल सफल होता है, तो यह सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकता है।