Sleep Tracking Apps Vs Reality: स्मार्टफोन के आने से जिंदगी पूरी तरह से बदल गई है। इस डिवाइस के जरिए लोग न केवल ऑडियो-वीडियो कॉल व मैसेज कर सकते हैं, बल्कि इंटरनेट का उपयोग करते हुए अपनी फिटनेस और डाइट को भी मॉनिटर करते हैं। कई लोग ऐसे भी हैं, जो अपने स्लीपिंग पैटर्न को सुधारने के लिए रोजाना अपनी नींद को ट्रैक करते हैं। इसके लिए वे मोबाइल, ऐप से लेकर स्मार्टवॉच तक का इस्तेमाल करते हैं।
इससे पता चलता है कि नींद कितनी गहरी थी और कितनी बार टूटी। अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई में हमें स्लीप ट्रैकिंग की जरूरत है। क्या हम अपने Sleeping Pattern को बेहतर बनाने के लिए जरूरत से ज्यादा नींद को मॉनिटर कर रहे हैं ?
क्या होते हैं Sleep Tracking Apps ?
स्लीप ट्रैकिंग ऐप ऐसी एप्लिकेशन हैं, जो यूजर के स्मार्टफोन या स्मार्टवॉच में मौजूद सेंसर का उपयोग करके नींद को ट्रैक करती हैं। ये ऐप यूजर के हार्ट-रेट, मूवमेंट और सांस लेने के पैटर्न को एनालाइज करके नींद से जुड़ा डेटा प्रदान करते हैं और एक स्कोर देते हैं। इससे पता चलता है कि नींद कैसी थी, कब गहरी हुई और यूजर नींद के दौरान कितनी बार उठा।
ये ऐप रिपोर्ट देने के साथ नींद को बेहतर बनाने का सुझाव भी देते हैं, जिन्हें आमतौर पर यूजर्स फॉलो करते हैं। विषेज्ञयों का मानना है कि ऐप से जनरेट हुआ डेटा पूरी तरह से सही नहीं होता है। यह एक अनुमान की तरह है। इसे पूरी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है।
क्या है रियलिटी
रिपोर्ट्स की मानें, तो स्लीप ट्रैकिंग ऐप यूजर की नींद को पूरी तरह से एनालाइज नहीं करते हैं। कई बार ये ऐप नींद के दौरान यूजर की बॉडी में हुई मूवमेंट को जगना समझ लेते हैं, तो उसके आधार पर गलत रिपोर्ट बना देते हैं, जिससे यूजर विचलित हो जाते हैं और ज्यादा सोचने लगते हैं। इससे तनाव बढ़ने लगता है।
ओवर-ट्रैकिंग की समस्या
विशेषज्ञों का मानना है कि नींद को ज्यादा मॉनिटर करने से ऑर्थोसोमनिया (Orthosomnia) की समस्या आ सकती है, जिसमें यूजर स्लीप को बेहतर करने के लिए ट्रैकर ऐप या वियरेबल डिवाइस पर निर्भर हो जाता है और वास्तविक चीजों पर ध्यान देने की बजाय डेटा पर अधिक ध्यान देने लगता है। इससे मानसिक शांति पूरी तरह से प्रभावित होने के साथ-साथ चिंता बढ़ने लगती है और तनाव भी बढ़ जाता है। इस कारण अनिद्रा (Insomnia) की दिक्कत पैदा हो जाती है। दैनिक जीवन भी प्रभावित होता है।
Add Techlusive as a Preferred Source
ऑर्थोसोमनिया से निजात पाने के लिए सबसे पहले ट्रैकिंग डिवाइस व ऐप का इस्तेमाल न करें। इसकी बजाय वास्तविक्ता पर ध्यान दें। यह जानने का प्रयास करें कि आप दिनभर में कितना फ्रेश और एनर्जेटिक रहते हैं। इसके साथ समय पर सोए और जागे। यही नहीं स्क्रीन टाइम को भी कम करिए।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि स्लीप ट्रैकिंग ऐप डिवाइस में मौजूद सेंसर की मदद से हार्ट-रेट और ब्रीथिंग पैटर्न को समझकर नींद की क्वालिटी बताते हैं, लेकिन इनका डेटा 100 प्रतिशत सही नहीं होता है, क्योंकि हर व्यक्ति का स्लीप पैटर्न अलग होता है। एक तरीके से की गई मॉनिटरिंग सभी पर लागू नहीं होती है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि ऐप व तकनीक का उपयोग सुझाव के लिए किया जा सकता है। अपनी सेहत और नींद को बेहतर बनाने के लिए ऐप की रिपोर्ट के साथ जीवनशैली को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
अच्छी नींद कभी स्कोर नहीं मापा जाता है। इसके लिए समय पर सोना और उठना पड़ता है। आप सुबह उठते ही अपने आपको तरोताजा और ऊर्जावान महसूस करते हैं, आपका मूड अच्छा है, तो समझ लें कि आपने बेहतर नींद ली है। इससे आप दिनभर एक्टिव रहेंगे और बिना थकान के अपने कार्य को पूरा कर सकेंगे।
संतुलन है जरूरी
स्लीप ट्रैकिंग ऐप (Sleep Tracking App) को पूरी तरह से बेकार कहना गलत है। इन ऐप का इस्तेमाल स्लीपिंग पैटर्न व हैबिट्स को समझने के लिए किया जा सकता है, लेकिन इन पर पूरी तरह से निर्भर होना सही नहीं है। हम सभी के लिए यह समझना आवश्यक है कि ऐप व तकनीक हमारे लिए है न कि हम उसके लिए। हमें इनका उपयोग सहायक के रूप में करना चाहिए। इससे फायदा यह होगा कि ओवर ट्रैकिंग की समस्या खत्म हो जाएगी और तनाव भी नहीं बढ़ेगा। मानसिक शांति बनी रहेगी। डेटा और वास्तविकता के बीच संतुलन बरकरार रहेगा।