Black Holes के राज खोलने वाली मशीन तैयार, वैज्ञानिकों ने किया बड़ा कमाल
ब्लैक होल और पल्सर जैसे रहस्यमयी अंतरिक्षीय पिंडों को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है। भारत और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक X-Ray डिटेक्टर डेवलप किया है, जो हाई-एनर्जी X-Ray किरणों को पहले से ज्यादा सटीक तरीके से पकड़ सकता है। यह टेक्नोलॉजी भविष्य में ब्रह्मांड के कई अनसुलझे रहस्यों को समझने में अहम भूमिका निभा सकती है। आइए जानते हैं...
Published By: Ashutosh Ojha | Published: Jun 16, 2026, 12:38 PM (IST)
अहमदाबाद की Physical Research Laboratory (PRL) और अमेरिका की Stanford University के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऐसा X-Ray डिटेक्टर डेवलप किया है, जो ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमयी और खतरनाक क्षेत्रों का अध्ययन करने में मदद कर सकता है। यह नया डिटेक्टर खासतौर पर ब्लैक होल, पल्सर और बाकी शक्तिशाली खगोलीय पिंडों से निकलने वाली हाई-एनर्जी या हार्ड X-Ray किरणों को पकड़ने के लिए बनाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह टेक्नोलॉजी अंतरिक्ष में मौजूद उन घटनाओं को समझने में मदद करेगी, जिन्हें अब तक विस्तार से देख पाना बेहद मुश्किल था। इस डिटेक्टर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह X-Ray की एनर्जी, उसकी दिशा और उसके स्रोत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी एक साथ जुटा सकता है।
हार्ड X-Ray किरणों का अध्ययन करना इतना जरूरी क्यों है?
हार्ड X-Ray किरणों का अध्ययन अंतरिक्ष विज्ञान में काफी अहम माना जाता है। इन किरणों की मदद से वैज्ञानिक ब्लैक होल, पल्सर और दूसरे दूर मौजूद खगोलीय पिंडों के बारे में ज्यादा जानकारी जुटा सकते हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि ये खगोलीय पिंड कैसे काम करते हैं और इनके आसपास का चुंबकीय क्षेत्र कैसा है। हालांकि, इन किरणों को पकड़ना आसान नहीं होता, क्योंकि ये बहुत कम मात्रा में पृथ्वी तक पहुंचती हैं। इस समस्या को हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने Sodium Iodide नाम के खास क्रिस्टल का इस्तेमाल किया है। जब X-Ray इस क्रिस्टल से टकराती है, तो उसमें हल्की रोशनी पैदा होती है। इसी रोशनी को मापकर वैज्ञानिक X-Ray और उसके स्रोत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी हासिल कर लेते हैं।
यह नया डिटेक्टर X-Ray की जानकारी कैसे जुटाता है?
इस नई टेक्नोलॉजी में वैज्ञानिकों ने 10 सेंटीमीटर लंबे Sodium Iodide क्रिस्टल के दोनों सिरों पर खास सेंसर लगाए हैं, जिन्हें Silicon Photomultiplier कहा जाता है। जब कोई X-Ray क्रिस्टल से टकराती है, तो उससे निकलने वाली हल्की रोशनी क्रिस्टल के दोनों सिरों तक पहुंचती है। सेंसर इस रोशनी को पकड़कर उसे मजबूत सिग्नल में बदल देते हैं। इसके बाद वैज्ञानिक दोनों सिरों से मिले सिग्नलों की तुलना करके पता लगाते हैं कि X-Ray क्रिस्टल के किस हिस्से से टकराई थी। वहीं सिग्नलों को मिलाकर X-Ray की एनर्जी भी मापी जा सकती है। टेस्टिंग के दौरान वैज्ञानिकों ने Americium नाम के Radioactive Source से X-Ray किरणें भेजीं। नतीजों में पता चला कि दोनों सेंसरों का एक साथ इस्तेमाल करने से गलत सिग्नल काफी कम हो गए और बैकग्राउंड नॉइज़ लगभग 10 गुना तक घट गई, जिससे माप पहले से कहीं ज्यादा सटीक हो गई।
यह टेक्नोलॉजी भविष्य में Space Research को कैसे बदल सकती है?
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह नया डिटेक्टर पुराने डिटेक्टरों की तुलना में ज्यादा बेहतर और सटीक है। पहले के डिटेक्टरों में केवल एक तरफ सेंसर लगाया जाता था, जिससे वे X-Ray किरणों को उतनी अच्छी तरह नहीं पकड़ पाते थे। नई टेक्नोलॉजी में दोनों तरफ सेंसर लगाए गए हैं, जिससे इसकी क्षमता बढ़ गई है। हालांकि अभी इसमें कुछ सुधार की जरूरत है, क्योंकि क्रिस्टल के किनारों पर इसकी कार्यक्षमता लगभग 40% तक कम हो जाती है। फिर भी इसे Space Research के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। भविष्य में इस डिटेक्टर को छोटे उपग्रहों में लगाया जा सकता है। इससे वैज्ञानिक ब्लैक होल के आसपास मौजूद बेहद गर्म गैस, पल्सर के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों और अंतरिक्ष की दूसरी रहस्यमयी घटनाओं का पहले से बेहतर अध्ययन कर सकेंगे। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह टेक्नोलॉजी ब्रह्मांड के कई बड़े रहस्यों को समझने में मदद करेगी।
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