सूरज की वजह से धरती पर गिर रहे पुराने सैटेलाइट! ISRO ने किया बड़ा खुलासा

सूरज की बढ़ती एक्टिविटी अब सिर्फ धरती के मौसम को ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में घूम रहे पुराने सैटेलाइट्स को भी प्रभावित कर रही है। ISRO की नई रिसर्च में बड़े खुलासे हुए हैं। आइए जानते हैं...

Published By: Ashutosh Ojha | Published: May 07, 2026, 12:06 PM (IST)

अंतरिक्ष में घूम रहे पुराने और खराब सैटेलाइट्स, जिन्हें स्पेस डेब्रिस या स्पेस जंक कहा जाता है, दुनिया भर की स्पेस एजेंसियों के लिए बड़ी परेशानी बन चुके हैं। अब भारत की स्पेस एजेंसी ISRO से जुड़ी एक नई रिसर्च में इस बारे में बेहद दिलचस्प बात सामने आई है। वैज्ञानिकों ने पहली बार साफ सबूत पाया है कि सूरज की बढ़ती एक्टिविटी पुराने और बेकार सैटेलाइट्स को तेजी से पृथ्वी की तरफ खींचने में मदद करती है। यह रिसर्च Vikram Sarabhai Space Centre के वैज्ञानिकों ने की है। रिसर्च के मुताबिक जब सूरज ज्यादा एक्टिव होता है, तो पृथ्वी के आसपास का वातावरण थोड़ा फैल जाता है। इससे अंतरिक्ष में घूम रहे पुराने सैटेलाइट्स और स्पेस जंक की स्पीड कम होने लगती है और वे धीरे-धीरे नीचे आने लगते हैं। आखिर में ये पृथ्वी के वातावरण में घुसकर जल जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज भविष्य में सुरक्षित स्पेस मिशन बनाने में काफी मदद करेगी। इस स्टडी में 34 साल से अंतरिक्ष में घूम रहे 17 अलग-अलग स्पेस ऑब्जेक्ट्स पर नजर रखी गई। लंबे समय से माना जा रहा था कि सूरज की गतिविधियों का असर स्पेस जंक पर पड़ता है, लेकिन अब पहली बार इसे साफ तौर पर साबित किया गया है। और पढें: ISRO का PSLV-C62 मिशन हुआ फेल, जानें अचानक ऐसा क्या हुआ?

आखिर सूरज की एक्टिविटी से कैसे गिरते हैं पुराने सैटेलाइट

वैज्ञानिकों के अनुसार सूरज लगभग 11 साल के एक सोलर साइकिल पर काम करता है। इस दौरान कभी उसकी गतिविधियां कम रहती हैं तो कभी बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं। जब सूरज अपने एक्टिव फेज में पहुंचता है, तब उसकी सतह पर सनस्पॉट्स यानी काले धब्बों की संख्या तेजी से बढ़ने लगती है। इसी दौरान सूरज से निकलने वाली तेज रेडिएशन पृथ्वी के ऊपरी वातावरण को गर्म करने लगती है। पृथ्वी के वातावरण की सबसे ऊपरी परत, जिसे थर्मोस्फीयर कहा जाता है, गर्म होकर ऊपर की तरफ फैलने लगती है। यही बदलाव अंतरिक्ष में घूम रहे पुराने सैटेलाइट्स और स्पेस डेब्रिस के लिए मुश्किल पैदा करता है। दरअसल जब यह परत फैलती है तो वहां हवा का घनत्व बढ़ जाता है। इससे अंतरिक्ष में मौजूद बेकार सैटेलाइट्स को ज्यादा एयर ड्रैग यानी घर्षण का सामना करना पड़ता है। यह घर्षण उनकी स्पीड कम कर देता है और उनकी ऑर्बिट धीरे-धीरे नीचे आने लगती है। आखिरकार वे पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश कर जलकर खत्म हो जाते हैं। रिसर्च में शामिल वैज्ञानिक Ayesha M. Ashraf ने बताया कि जैसे ही सोलर एक्टिविटी अपने पीक लेवल के करीब 70 प्रतिशत तक पहुंचती है, स्पेस डेब्रिस की ऊंचाई तेजी से कम होने लगती है। यह पैटर्न लगातार तीन सोलर साइकल्स में देखा गया, जिससे इस थ्योरी को मजबूत वैज्ञानिक आधार मिला है।

34 साल की स्टडी में मिले बेहद अहम संकेत

इस रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने 1986 से 2024 तक तीन अलग-अलग सोलर साइकल्स का एनालिसिस किया। उन्होंने पृथ्वी से करीब 160 से 2000 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद 17 स्पेस ऑब्जेक्ट्स को ट्रैक किया। ये ऑब्जेक्ट्स हर 90 से 120 मिनट में पृथ्वी का चक्कर लगा रहे थे। रिसर्च में पाया गया कि जैसे ही सूरज की गतिविधियां बढ़ीं, इन सभी ऑब्जेक्ट्स की ऊंचाई कई किलोमीटर तक तेजी से घटने लगी। वैज्ञानिकों के लिए सबसे दिलचस्प बात यह रही कि यह बदलाव हर बार लगभग एक जैसे पैटर्न में दिखाई दिया। इसका मतलब यह है कि भविष्य में वैज्ञानिक पहले से अनुमान लगा सकते हैं कि किस समय स्पेस डेब्रिस तेजी से पृथ्वी की ओर लौटेगा। आज दुनिया भर में हजारों निष्क्रिय सैटेलाइट्स और लाखों छोटे-बड़े मलबे के टुकड़े पृथ्वी की ऑर्बिट में घूम रहे हैं। ये एक्टिव सैटेलाइट्स और स्पेस मिशनों के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। कई बार छोटे टुकड़े भी तेज रफ्तार के कारण भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में यह रिसर्च स्पेस एजेंसियों को बेहतर तरीके से मिशन प्लान करने में मदद दे सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर सोलर एक्टिविटी के समय को ध्यान में रखकर लॉन्च प्लान किए जाएं, तो भविष्य में स्पेस ट्रैफिक और टक्कर के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

भविष्य के स्पेस मिशनों के लिए यह खोज बेहद जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स की संख्या बहुत तेजी से बढ़ने वाली है। कई प्राइवेट कंपनियां भी हजारों नए सैटेलाइट लॉन्च कर रही हैं। इसी वजह से पृथ्वी के आसपास ऑर्बिट अब पहले से ज्यादा हो गई है। ऐसे में अंतरिक्ष में फैले कचरे यानी स्पेस डेब्रिस को कंट्रोल करना पूरी दुनिया के लिए जरूरी बन गया है। ISRO की यह नई रिसर्च इस समस्या का हल ढूंढने में बड़ी मदद कर सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर पहले से पता चल जाए कि सूरज की कौन-सी गतिविधियां पुराने सैटेलाइट्स को जल्दी नीचे लाएंगी, तो नए मिशनों की प्लानिंग ज्यादा सुरक्षित तरीके से की जा सकती है। इससे भविष्य में स्पेस स्टेशन, कम्युनिकेशन सैटेलाइट्स और दूसरे वैज्ञानिक मिशनों को अंतरिक्ष में टक्कर से बचाने में मदद मिलेगी। यह रिसर्च यह भी दिखाती है कि प्रकृति खुद भी अंतरिक्ष की सफाई करने में मदद करती है, हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि सिर्फ सूरज की एक्टिविटी पर भरोसा करना काफी नहीं होगा। स्पेस एजेंसियों को पुराने सैटेलाइट्स को सुरक्षित तरीके से हटाने और अंतरिक्ष में कचरा कम करने के लिए नई टेक्नोलॉजी पर तेजी से काम करना होगा, फिर भी सूरज की इस प्राकृतिक प्रक्रिया को समझना भविष्य के सुरक्षित और बेहतर स्पेस मिशनों के लिए बहुत जरूरी माना जा रहा है।

FAQ

स्पेस डेब्रिस या स्पेस जंक क्या होता है?

स्पेस डेब्रिस उन पुराने, खराब या बेकार सैटेलाइट्स और रॉकेट के टुकड़ों को कहा जाता है जो अंतरिक्ष में पृथ्वी की ऑर्बिट में घूमते रहते हैं। ये एक्टिव सैटेलाइट्स और स्पेस मिशनों के लिए खतरा बन सकते हैं।

सूरज की एक्टिविटी पुराने सैटेलाइट्स को कैसे प्रभावित करती है?

जब सूरज ज्यादा एक्टिव होता है, तब उसकी रेडिएशन पृथ्वी के ऊपरी वातावरण को गर्म कर देती है। इससे वातावरण फैलता है और स्पेस डेब्रिस पर एयर ड्रैग बढ़ जाता है, जिससे उनकी स्पीड कम होकर वे धीरे-धीरे पृथ्वी की तरफ आने लगते हैं।

क्या पुराने सैटेलाइट्स धरती पर गिरकर नुकसान पहुंचाते हैं?

ज्यादातर पुराने सैटेलाइट्स पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते ही जलकर खत्म हो जाते हैं, हालांकि कुछ बड़े हिस्से कभी-कभी धरती तक पहुंच सकते हैं, इसलिए वैज्ञानिक लगातार उनकी निगरानी करते हैं।

ISRO की इस रिसर्च में क्या खास पता चला?

ISRO के वैज्ञानिकों ने पहली बार साफ सबूत दिया है कि सोलर एक्टिविटी बढ़ने पर स्पेस डेब्रिस तेजी से नीचे आने लगता है। यह पैटर्न लगातार तीन सोलर साइकल्स में देखा गया।

इस रिसर्च से भविष्य के स्पेस मिशनों को क्या फायदा होगा?

इस खोज से वैज्ञानिक पहले से अनुमान लगा सकेंगे कि कब स्पेस डेब्रिस बढ़ सकता है। इससे सैटेलाइट लॉन्च और स्पेस मिशनों की प्लानिंग ज्यादा सुरक्षित तरीके से की जा सकेगी।

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