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	<title><![CDATA[Latest Technology &amp; Gadgets - News in Hindi | News &amp; Reviews on Gadgets, Smart Phones, Mobile Apps &amp; Gaming | टेक न्यूज़ इन हिंदी | TECHLUSIVE.in Hindi]]></title>
	<description><![CDATA[Latest Technology &amp; Gadgets - News in Hindi | News &amp; Reviews on Gadgets, Smart Phones, Mobile Apps &amp; Gaming | टेक न्यूज़ इन हिंदी | TECHLUSIVE.in Hindi]]></description>
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		<pubDate>Wed, 17 Jun 2026 05:27:09 +0000</pubDate>
		<title><![CDATA[धरती के बाहर मिला गैस और पानी का खजाना! NASA की रिपोर्ट ने चौंकाया]]></title>
		<description>Saturn planet का सबसे बड़ा चंद्रमा टाइटन (Titan) एक बार फिर वैज्ञानिकों की चर्चा का केंद्र बन गया है। NASA की मदद से किए गए एक नए अध्ययन में पता चला है कि टाइटन पर प्राकृतिक गैसों और पानी की बर्फ का विशाल भंडार मौजूद है। आइए जानते हैं...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Saturn planet का सबसे बड़ा चंद्रमा टाइटन (Titan) भविष्य में इंसानों के लिए पृथ्वी के बाहर एक बेहद जरूरी जगह बन सकता है। NASA की मदद से किए गए एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने टाइटन पर मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का अध्ययन किया है। रिपोर्ट के मुताबिक वहां Methane और Ethane जैसी गैसों, पानी की बर्फ और कई यूजफुल रासायनिक तत्वों का विशाल भंडार मौजूद है। इन संसाधनों का इस्तेमाल भविष्य में अंतरिक्ष यानों के ईंधन, इमारतें बनाने और अंतरिक्ष यात्रियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है। इसी वजह से कुछ वैज्ञानिक टाइटन को अंतरिक्ष का &#8216;Persian Gulf&#8217; भी कह रहे हैं। यह अध्ययन NASA के Goddard Space Flight Center के वैज्ञानिक Conor A. Nixon और उनकी टीम ने Cassini-Huygens मिशन से मिले कई सालों के डेटा के आधार पर किया है।</p>
<h2><strong>टाइटन की झीलों में ऐसा क्या है जो अंतरिक्ष मिशनों के काम आ सकता है?</strong></h2>
</p>
<p>टाइटन सौरमंडल की सबसे अनोखी दुनियाओं में से एक है। यह एकमात्र ऐसा चंद्रमा है जिसके पास घना वायुमंडल है और इसकी सतह पर स्थायी झीलें, नदियां और समुद्र मौजूद हैं, हालांकि इनमें पानी नहीं बल्कि तरल Methane और Ethane भरे हुए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार टाइटन पर मौजूद मीथेन भविष्य में रॉकेट ईंधन के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है, जबकि बाकी हाइड्रोकार्बन से प्लास्टिक, रसायन, सिंथेटिक चीजें और औद्योगिक प्रोडक्ट तैयार किए जा सकते हैं। टाइटन पर मीथेन का अपना मौसम चक्र भी चलता है, जहां यह Vapour बनकर बादलों में बदलती है और फिर बारिश के रूप में वापस सतह पर गिरती है। यही कारण है कि इसे भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है।</p>
<h2><strong>टाइटन पर मौजूद पानी क्यों माना जा रहा है सबसे कीमती संसाधन?</strong></h2>
</p>
<p>टाइटन की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ उसकी प्राकृतिक गैसें नहीं हैं, बल्कि वहां मौजूद पानी भी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि टाइटन का लगभग आधा हिस्सा पानी की बर्फ से बना हुआ है। इसकी बर्फीली सतह के नीचे एक विशाल तरल पानी का महासागर भी हो सकता है, जिसमें नमक और अमोनिया मिले हुए हैं। पानी इंसानों के लिए सबसे जरूरी संसाधनों में से एक है, क्योंकि इससे पीने का पानी, सांस लेने के लिए ऑक्सीजन और ईंधन बनाने के लिए हाइड्रोजन हासिल की जा सकती है। वैज्ञानिक पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करके रॉकेट का ईंधन भी बना सकते हैं। यही वजह है कि टाइटन पर पानी की इतनी बड़ी मात्रा भविष्य में इंसानों के रहने और अंतरिक्ष मिशनों के लिए इसे एक बेहद अहम जगह बना सकती है।</p>
<h2><strong>क्या टाइटन भविष्य में अंतरिक्ष का बड़ा ईंधन केंद्र बन सकता है?</strong></h2>
</p>
<p>अध्ययन के मुताबिक टाइटन भविष्य में सिर्फ अंतरिक्ष यानों के लिए ईंधन भरने की जगह नहीं होगा, बल्कि एक बड़ा औद्योगिक केंद्र भी बन सकता है। वहां मौजूद संसाधनों का इस्तेमाल करके इमारतें बनाने की चीजें, खेती के लिए जरूरी चीजें, 3D प्रिंटिंग का कच्चा माल और अंतरिक्ष मिशनों में काम आने वाले उपकरण तैयार किए जा सकते हैं। टाइटन की स्थिति भी काफी अहम है, क्योंकि यह Saturn के दूसरे चंद्रमाओं और सौरमंडल के दूर-दराज इलाकों में जाने वाले मिशनों के लिए एक पड़ाव की तरह काम कर सकता है, हालांकि वहां का तापमान करीब -179 डिग्री सेल्सियस रहता है और यह पृथ्वी से लगभग 1.4 अरब किलोमीटर दूर है, इसलिए वहां इंसानों की बस्ती बसाना अभी आसान नहीं है। आने वाले समय में NASA का Dragonfly Mission टाइटन की सतह का अध्ययन करेगा, जिससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि भविष्य में यह चंद्रमा इंसानों के लिए कितना यूजफुल साबित हो सकता है।</p>
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		<media:description type='plain'><![CDATA[Titan moon]]></media:description>
		</media:content>
		<guid isPermaLink='true'>https://www.techlusive.in/hi/news/titan-could-become-humanity-future-space-hub-nasa-study-reveals-vast-natural-resources-1666169/</guid>
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		<dc:creator><![CDATA[Ashutosh Ojha]]></dc:creator>
	 </item>
	 <item>
		<pubDate>Wed, 17 Jun 2026 03:53:14 +0000</pubDate>
		<title><![CDATA[शानदार फीचर्स के साथ Android 17 हुआ लॉन्च, इन यूजर्स को मिलेगा सबसे पहले Update]]></title>
		<description>Android 17 को ऑफिशियली लॉन्च कर दिया गया है। इस ओएस का सपोर्ट सबसे पहले Google Pixel यूजर्स को मिलेगा। इसमें बबल्स, स्क्रीन रीएक्शन और फोल्डेबल गेमिंग मोड जैसे शानदार फीचर्स दिए गए हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><strong>Android 17 Launched:</strong> दिग्गज टेक कंपनी गूगल (Google) ने पिछले कई महीनों से खबरों में बने ऑपरेटिंग सिस्टम Android 17 को आधिकारिक तौर पर लॉन्च कर दिया है। नए OS को यूजर्स को बेहतर प्रोडक्टिविटी, तेज परफॉर्मेंस, शानदार एंटरटेनमेंट एक्सपीरियंस और मजबूत प्राइवेसी देने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें स्क्रीन रीएक्शन (Screen Reaction), फोल्डेबल गेमिंग मोड (Foldable Gaming Mode) और एंटी थेफ्ट (Anti-Theft) जैसे एडवांस फीचर्स शामिल किए गए हैं, जिनके इस्तेमाल से न सिर्फ यूजर्स का अनुभव बेहतर होगा बल्कि उनका निजी डेटा भी सुरक्षित रहेगा।</p>
<h2>Bubbles</h2>
</p>
<p><strong><a href="https://www.techlusive.in/hi/news/android-17-brings-advanced-scam-detection-theft-protection-ai-security-features-1662087/">Android 17</a></strong> में मल्टीटास्किंग को आसान बनाने के लिए अपग्रेडेड बबल फीचर दिया गया है। इस फीचर की मदद से यूजर्स किसी भी ऐप के आइकन को देर तक दबाकर उसे एक छोटे फ्लोटिंग विंडो में बदल सकते हैं, जो दूसरी ऐप्स के ऊपर दिखाई देगी। इससे आप किसी ऐप को बंद किए बिना दूसरे ऐप का उपयोग कर सकते हैं।</p>
</p>
<p>अब टैबलेट और फोल्डेबल फोन की बात करें, तो इन दोनों डिवाइस की स्क्रीन के नीचे एक नया बबल बार (Bubble Bar) दिया गया है। इसके जरिए आप एक टैप करके अलग-अलग ऐप में स्विच करने के साथ उनका इस्तेमाल कर सकते हैं।</p>
<h2>Screen Reactions</h2>
</p>
<p>लेटेस्ट ओएस में स्क्रीन रिएक्शन फीचर को जगह दी गई है। इस फीचर के जरिए यूजर्स अपने फोन के सेल्फी कैमरा का इस्तेमाल करके स्क्रीन रिकॉर्ड कर सकते हैं। कंपनी का कहना है कि इस टूल के माध्यम से रीएक्शन वीडियो आसानी से रिकॉर्ड की जा सकती है। इसके लिए ग्रीन स्क्रीन या फिर अलग से एडिटिंग सॉफ्टवेयर यूज करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।</p>
<h2>Foldable Gaming Mode</h2>
</p>
<p>बेहतर गेमिंग एक्सपीरियंस देने के लिए इस बार एंड्रॉइड 17 में फोल्डेबल गेमिंग मोड दिया गया है। इस फीचर के एक्टिव होने पर स्क्रीन दो भाग में बंट जाती है। ऊपर वाले हिस्से में गेम और नीचे वाले हिस्से में गेमिंग पैड देखने को मिलता है। इसकी मदद से आसानी से गेम खेला जा सकता है। अच्छी बात यह है कि इस पैड को अपने हिसाब से कस्टामाइज भी किया जा सकता है।</p>
<h2>Visual and Privacy</h2>
</p>
<p>फोन के इंटरफेस को शानदार लुक देने के लिए एंड्रॉइड 17 में स्क्रीन सेटिंग दी गई है, जिससे ऐप के नाम और उनके आइकन को छिपाया जा सकता है। इसमें वर्चुअल असिस्टेंट के लिए अलग से वॉल्यूम कंट्रोल दिया गया है। डार्क थीम को भी बेहतर बनाया गया है। इतना ही नहीं Parental Controls की सुविधा भी दी गई है।</p>
</p>
<p>यूजर्स की प्राइवेसी को ध्यान में रखकर मार्क एस लॉस्ट फीचर को एड किया गया है, जो यूजर्स को डिवाइस के गुम या फिर चोरी होने पर लॉक करने की सुविधा प्रदान करता है। इसके साथ ही स्कैम प्रोटेक्शन, Thief deterrent और Targeted privacy जैसे फीचर्स भी दिए गए हैं।</p>
<h2>इन यूजर्स को मिलेगा सबसे पहले Update</h2>
</p>
<p>आपको बता दें कि लेटेस्ट ऑपरेटिंग सिस्टम का अपडेट सबसे पहले <strong><a href="https://www.techlusive.in/hi/best-deals/google-pixel-10-discount-in-india-vijay-sales-smartphones-offers-1659088/">Pixel</a></strong> यूजर्स को मिलेगा। इसके बाद अन्य Android यूजर्स को अपडेट दिया जाएगा।</p>
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		</media:content>
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		<dc:creator><![CDATA[ajay verma]]></dc:creator>
	 </item>
	 <item>
		<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 11:26:27 +0000</pubDate>
		<title><![CDATA[Gen-Zs का नया स्ट्रेस बस्टर बन गई हैं ये Dopamine sites! जमकर हो रही शॉपिंग.. लेकिन पैसे नहीं हो रहे खर्च, जानें कैसे]]></title>
		<description>Dopamine sites का क्रेज युवाओं के बीच काफी बढ़ता जा रहा है। इन साइट्स के जरिए Gen Z जमकर शॉपिंग करके अपना स्ट्रेस रिलीज करते हैं। खास बात यह है कि इन साइट्स के जरिए शॉपिंग करने पर उनका 1 भी रुपया खर्च नहीं होता। आइए जानते हैं कैसे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><strong>Dopamine sites:</strong> Gen-Zs ऐसी जनरेशन हैं, जो नए-नए ट्रेंड्स लाकर अपने से पुरानी जनरेशन के लोगों को हमेशा चौंका देती है। कुछ ऐसा ही ट्रेंड एक बार फिर Gen Z लेकर आ गए हैं, जिसको सुनकर हर कोई हैरान हो रहा है। दरअसल, Gen Z के बीच इन दिनों नया डिजिटल ट्रेंड फेमस हो रहा है। यह Dopamine sites का क्रेज है, जहां से वो लोग जमकर शॉपिंग तो कर रहे हैं&#8230; लेकिन उनके एक भी पैसे खर्च नहीं हो रहे हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा कैसे संभव है??? संभव है&#8230; दरअसल, ये Dopamine sites असल में कोई कोई शॉपिंग साइट्स नहीं है। ये बस देखने में असल वेबसाइट की तरह लगती है, जहां से आप अपने फेवरेट ऑर्डर को कार्ट में डालकर ऑर्डर तो करते हैं&#8230; लेकिन न तो उस ऑर्डर के पैसे कटते हैं और न ही वो ऑर्डर उन्हें कभी रिसीव होता है। इन साइट्स का उद्देश्य पैसे खर्च करके की गई शॉपिंग से मिलने वाली खुशी या फिर डोपामिन को बिना पैसे खर्च किए आप-तक पहुंचाना है। खास बात यह है कि जेन-जी इन साइट्स का काफी बढ़-चढ़कर इस्तेमाल कर रहे हैं। आइए जानते हैं सभी डिटेल्स।</p>
<h2>क्या है Dopamine sites?</h2>
</p>
<p>जैसे कि हमने बताया <a href="https://www.techlusive.in/hi/news/doomscrolling-dopamine-how-social-media-scrolling-impacts-your-brain-stress-and-cravings-1654083/">Dopamine</a> sites असल जैसी दिखने वाली वेबसाइट्स हैं, जो कि असल में कुछ बेच नहीं रही हैं। आपने महसूस किया होगा कि शॉपिंग के बाद आपको एक अलग-सी खुशी मिलती है या फिर डोपामिन रश प्राप्त होता है&#8230; उसी खुशी को ये साइट्स बिना पैसे खर्च किए आपको प्रोवाइड कर रही हैं। ये साइट्स देखने में बिल्कुल असली लगती हैं, जिसमें शॉपिंग करने के लिए काफी सामान मौजूद होता है। आप अपने मनपसंद के सामान को कार्ट में डालते हैं और फिर ऑर्डर कर देते हैं। लेकिन असल में कोई असली ऑर्डर प्लेस नहीं हो रहा है&#8230; न ही आपके पैसे खर्च हो रहे हैं&#8230; और न ही आपको कोई ऑर्डर रिसीव होने वाला है। हालांकि, ये पूरी प्रक्रिया आपको असल-सी लगती है और आपको कुछ मिनटों खुशी प्राप्त होती है।</p>
</p>
<div id="attachment_1666092" style="width: 1290px" class="wp-caption alignnone"><a href="https://www.techlusive.in/wp-content/uploads/2026/06/1-22-1.jpg"><img loading="lazy" aria-describedby="caption-attachment-1666092" class="size-full wp-image-1666092" src="https://www.techlusive.in/wp-content/uploads/2026/06/1-22-1.jpg" alt="" width="1280" height="900" /></a></p>
<p id="caption-attachment-1666092" class="wp-caption-text">reddit</p>
</div>
<h2>Gen-Zs के बीच क्यों पॉपुलर हो रही ऐसी साइट्स?</h2>
</p>
<div id="attachment_1666093" style="width: 1290px" class="wp-caption alignnone"><a href="https://www.techlusive.in/wp-content/uploads/2026/06/1-23.jpg"><img loading="lazy" aria-describedby="caption-attachment-1666093" class="size-full wp-image-1666093" src="https://www.techlusive.in/wp-content/uploads/2026/06/1-23.jpg" alt="" width="1280" height="900" /></a></p>
<p id="caption-attachment-1666093" class="wp-caption-text">AI Generated Image</p>
</div>
</p>
<p>आपको बता दें, फिलहाल ये क्रेज दक्षिण कोरिया के युवाओं के बीच देखा जा रहा है। हालांकि, आने वाले दिनों में दूसरे देश भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। Jungwon University के प्रोफेसर Kim Heon-sik ने इन साइट्स की बढ़ती लोकप्रियता को लेकर कहा कि आज की युवा पीढ़ी छोटे-छोटे डिजिटल एक्सपीरियंस से अपना स्ट्रेस कम करने की कोशिश करती है। इसी वजह से अब इन फेक साइट्स का क्रेज बढ़ता जा रहा है, जहां शॉपिंग का एक्सपीरियंस भी मिल जाता है और कोई पैसे भी खर्च नहीं होते।</p>
</p>
<p>इस तरह की साइट्स की लोकप्रियता का बढ़ना, दिखाता है कि अब डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ आपके आराम या फिर मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रह गया है। अब लोग अपने तनाव को कम करने व इमोशनल सपोर्ट के लिए भी डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं।</p>
]]></content:encoded>
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		</media:content>
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		<dc:creator><![CDATA[Manisha]]></dc:creator>
	 </item>
	 <item>
		<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 11:11:40 +0000</pubDate>
		<title><![CDATA[दो बार फेल होने के बाद फिर उड़ान भरेगा PSLV, ISRO ने किया बड़ा ऐलान]]></title>
		<description>ISRO एक बार फिर अपने भरोसेमंद रॉकेट PSLV को लॉन्च करने की तैयारी में है, लगातार दो मिशन फेल होने के बाद यह उड़ान अंतरिक्ष एजेंसी के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। साथ ही Skyroot के Vikram-I मिशन और Gaganyaan की तैयारियों को लेकर भी बड़े अपडेट सामने आए हैं। आइए जानते हैं...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ISRO अपने सबसे भरोसेमंद रॉकेट PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) को एक बार फिर लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है, लगातार दो मिशन फेल होने के बाद यह लॉन्च ISRO के लिए काफी जरूरी माना जा रहा है। Union Minister of Science and Technology Dr. Jitendra Singh ने सोमवार को बताया कि PSLV की अगली उड़ान जून के आखिर या जुलाई की शुरुआत में हो सकती है, पिछले कुछ महीनों से ISRO ने कोई रॉकेट लॉन्च नहीं किया है। इसकी वजह यह है कि जनवरी 2026 में PSLV के जरिए लॉन्च किया गया EOS-N1 Satellite अपनी तय कक्षा में नहीं पहुंच सका था। इससे पहले मई 2025 में भी PSLV, EOS-09 सैटेलाइट को उसकी तय कक्षा में नहीं पहुंचा पाया था, लगातार दो मिशन फेल होने के बाद ISRO ने दोनों मामलों की गहराई से जांच की और रॉकेट में जरूरी बदलाव किए। अब ISRO को उम्मीद है कि अगला PSLV मिशन सफल रहेगा और वह एक बार फिर अपनी भरोसेमंद पहचान साबित कर पाएगा।</p>
<h2><strong>पिछले दो PSLV मिशन आखिर क्यों हुए फेल?</strong></h2>
</p>
<p>जानकारी के अनुसार, दोनों मिशनों में रॉकेट के तीसरे चरण (Third Stage) में तकनीकी समस्याएं सामने आई थीं। ISRO ने यह स्पष्ट किया है कि दोनों विफलताओं के कारण अलग-अलग थे, हालांकि दोनों मामलों में समस्या रॉकेट के उसी चरण में हुई। सूत्रों का कहना है कि कुछ ऐसे पुर्जों में खराबी मिली थी, जिनका निर्माण ISRO ने नहीं बल्कि बाहरी कंपनियों ने किया था। इसी वजह से आने वाले मिशनों के लिए संबंधित कंपोनेंट्स के सप्लायर बदल दिए गए हैं। हालांकि विफलता जांच समिति (Failure Assessment Committee) की पूरी रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन ISRO ने जरूरी सुधारों के बाद अगली उड़ान के लिए तैयारियां तेज कर दी हैं। यह लॉन्च एजेंसी के लिए भरोसा बहाल करने और PSLV की विश्वसनीयता साबित करने का महत्वपूर्ण अवसर होगा।</p>
<h2><strong>Skyroot का Vikram-I मिशन क्यों है खास?</strong></h2>
</p>
<p>PSLV के अलावा भारत की Private Space Companies भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं। Private Space Companies Skyroot Aerospace अपने पहले ऑर्बिटल मिशन Vikram-I की तैयारी कर रही है। अप्रैल के आखिर में रॉकेट का पेलोड फेयरिंग (वह हिस्सा जिसमें सैटेलाइट रखी जाती है) श्रीहरिकोटा के स्पेसपोर्ट पहुंचा दिया गया था। माना जा रहा है कि Skyroot Aerospace अगले कुछ महीनों में अपना यह बड़ा लॉन्च कर सकती है। अगर यह मिशन सफल रहता है, तो यह भारत की Private Space Companies के लिए बड़ी उपलब्धि होगी और देश में अंतरिक्ष कारोबार को और तेजी से बढ़ाने में मदद करेगा।</p>
<h2><strong>Gaganyaan Mission को लेकर ISRO की क्या तैयारी है?</strong></h2>
</p>
<p>इस समय ISRO का सबसे बड़ा ध्यान Gaganyaan Mission पर है, जिसके जरिए भारत पहली बार अपने अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजेगा। केंद्रीय मंत्री Jitendra Singh ने बताया कि कोविड-19 महामारी और कुछ बाकी कारणों की वजह से इस मिशन में देरी हुई थी। उस समय रूस में ट्रेनिंग ले रहे भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को भी वापस बुलाना पड़ा था, जिससे तैयारियां प्रभावित हुईं। अब ISRO का लक्ष्य इस साल के अंत तक सभी जरूरी परीक्षण पूरे करना है। मिशन भेजने से पहले एजेंसी कम से कम दो बिना अंतरिक्ष यात्री वाले (Uncrewed) मिशन लॉन्च करेगी, जरूरत पड़ने पर एक अतिरिक्त परीक्षण भी किया जा सकता है। इन सभी टेस्ट के सफल होने के बाद ही भारत अपने अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने का ऐतिहासिक कदम उठाएगा।</p>
]]></content:encoded>
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		<media:description type='plain'><![CDATA[ISRO PSLV launch 2026]]></media:description>
		</media:content>
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		<dc:creator><![CDATA[Ashutosh Ojha]]></dc:creator>
	 </item>
	 <item>
		<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 07:08:10 +0000</pubDate>
		<title><![CDATA[Black Holes के राज खोलने वाली मशीन तैयार, वैज्ञानिकों ने किया बड़ा कमाल]]></title>
		<description>ब्लैक होल और पल्सर जैसे रहस्यमयी अंतरिक्षीय पिंडों को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है। भारत और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक X-Ray डिटेक्टर डेवलप किया है, जो हाई-एनर्जी X-Ray किरणों को पहले से ज्यादा सटीक तरीके से पकड़ सकता है। यह टेक्नोलॉजी भविष्य में ब्रह्मांड के कई अनसुलझे रहस्यों को समझने में अहम भूमिका निभा सकती है। आइए जानते हैं...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अहमदाबाद की Physical Research Laboratory (PRL) और अमेरिका की Stanford University के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऐसा X-Ray डिटेक्टर डेवलप किया है, जो ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमयी और खतरनाक क्षेत्रों का अध्ययन करने में मदद कर सकता है। यह नया डिटेक्टर खासतौर पर ब्लैक होल, पल्सर और बाकी शक्तिशाली खगोलीय पिंडों से निकलने वाली हाई-एनर्जी या हार्ड X-Ray किरणों को पकड़ने के लिए बनाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह टेक्नोलॉजी अंतरिक्ष में मौजूद उन घटनाओं को समझने में मदद करेगी, जिन्हें अब तक विस्तार से देख पाना बेहद मुश्किल था। इस डिटेक्टर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह X-Ray की एनर्जी, उसकी दिशा और उसके स्रोत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी एक साथ जुटा सकता है।</p>
<h2><strong>हार्ड X-Ray किरणों का अध्ययन करना इतना जरूरी क्यों है?</strong></h2>
</p>
<p>हार्ड X-Ray किरणों का अध्ययन अंतरिक्ष विज्ञान में काफी अहम माना जाता है। इन किरणों की मदद से वैज्ञानिक ब्लैक होल, पल्सर और दूसरे दूर मौजूद खगोलीय पिंडों के बारे में ज्यादा जानकारी जुटा सकते हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि ये खगोलीय पिंड कैसे काम करते हैं और इनके आसपास का चुंबकीय क्षेत्र कैसा है। हालांकि, इन किरणों को पकड़ना आसान नहीं होता, क्योंकि ये बहुत कम मात्रा में पृथ्वी तक पहुंचती हैं। इस समस्या को हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने Sodium Iodide नाम के खास क्रिस्टल का इस्तेमाल किया है। जब X-Ray इस क्रिस्टल से टकराती है, तो उसमें हल्की रोशनी पैदा होती है। इसी रोशनी को मापकर वैज्ञानिक X-Ray और उसके स्रोत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी हासिल कर लेते हैं।</p>
<h2><strong>यह नया डिटेक्टर X-Ray की जानकारी कैसे जुटाता है?</strong></h2>
</p>
<p>इस नई टेक्नोलॉजी में वैज्ञानिकों ने 10 सेंटीमीटर लंबे Sodium Iodide क्रिस्टल के दोनों सिरों पर खास सेंसर लगाए हैं, जिन्हें Silicon Photomultiplier कहा जाता है। जब कोई X-Ray क्रिस्टल से टकराती है, तो उससे निकलने वाली हल्की रोशनी क्रिस्टल के दोनों सिरों तक पहुंचती है। सेंसर इस रोशनी को पकड़कर उसे मजबूत सिग्नल में बदल देते हैं। इसके बाद वैज्ञानिक दोनों सिरों से मिले सिग्नलों की तुलना करके पता लगाते हैं कि X-Ray क्रिस्टल के किस हिस्से से टकराई थी। वहीं सिग्नलों को मिलाकर X-Ray की एनर्जी भी मापी जा सकती है। टेस्टिंग के दौरान वैज्ञानिकों ने Americium नाम के Radioactive Source से X-Ray किरणें भेजीं। नतीजों में पता चला कि दोनों सेंसरों का एक साथ इस्तेमाल करने से गलत सिग्नल काफी कम हो गए और बैकग्राउंड नॉइज़ लगभग 10 गुना तक घट गई, जिससे माप पहले से कहीं ज्यादा सटीक हो गई।</p>
<h2><strong>यह टेक्नोलॉजी भविष्य में Space Research को कैसे बदल सकती है?</strong></h2>
</p>
<p>वैज्ञानिकों का कहना है कि यह नया डिटेक्टर पुराने डिटेक्टरों की तुलना में ज्यादा बेहतर और सटीक है। पहले के डिटेक्टरों में केवल एक तरफ सेंसर लगाया जाता था, जिससे वे X-Ray किरणों को उतनी अच्छी तरह नहीं पकड़ पाते थे। नई टेक्नोलॉजी में दोनों तरफ सेंसर लगाए गए हैं, जिससे इसकी क्षमता बढ़ गई है। हालांकि अभी इसमें कुछ सुधार की जरूरत है, क्योंकि क्रिस्टल के किनारों पर इसकी कार्यक्षमता लगभग 40% तक कम हो जाती है। फिर भी इसे Space Research के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। भविष्य में इस डिटेक्टर को छोटे उपग्रहों में लगाया जा सकता है। इससे वैज्ञानिक ब्लैक होल के आसपास मौजूद बेहद गर्म गैस, पल्सर के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों और अंतरिक्ष की दूसरी रहस्यमयी घटनाओं का पहले से बेहतर अध्ययन कर सकेंगे। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह टेक्नोलॉजी ब्रह्मांड के कई बड़े रहस्यों को समझने में मदद करेगी।</p>
]]></content:encoded>
		<media:content url='https://st1.techlusive.in/wp-content/uploads/2026/05/Black-Hole.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='805' >
		<media:description type='plain'><![CDATA[Black Hole]]></media:description>
		</media:content>
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		<dc:creator><![CDATA[Ashutosh Ojha]]></dc:creator>
	 </item>
	 <item>
		<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 03:05:10 +0000</pubDate>
		<title><![CDATA[वेब में भी मिलेगा Google Earth का Flight Simulator टूल, घर बैठे कर सकेंगे दुनिया की सैर]]></title>
		<description>Google Earth यूज करने वालों के लिए खुशखबरी है। गूगल ने वेब वर्जन के लिए Flight Simulator टूल को रोलआउट कर दिया है। इसकी मदद से अब आप उड़ान भर सकते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><strong>Google Earth</strong> पॉपुलर डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसमें सैटेलाइट इमेज, Aerial फोटो और 3डी डेटा को जोड़कर वर्चुअल मॉडल तैयार किया जाता है। इसके जरिए दुनिया के हर एक कोने को एक्सप्लोयर किया जा सकता है। इसमें 3डी, ग्राउंड लेवल और स्ट्रीट जैसे कई फीचर मिलते हैं। इनमें से एक Flight Simulator भी है, जिसे अब वेब वर्जन के लिए रोलआउट कर दिया गया है। इसकी मदद से र्चुअल उड़ान भरी जा सकती है। इसके लिए डेस्कटॉप ऐप डाउनलोड करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।</p>
</p>
<p>गूगल के अनुसार, <strong><a href="https://www.techlusive.in/hi/tips-and-tricks/how-to-turn-off-google-chrome-track-feature-in-smartphone-and-laptop-1665586/">Google</a></strong> Earth के Flight Simulator की मदद से अब वर्चुअली ट्रैवल किया जा सकता है। इस फंक्शन को खासतौर पर मनोरंजन के लिए तैयार किया गया है। इसके अलावा, Elevation Profiles, नए Import Types और अतिरिक्त Data Layers जैसे टूल को भी एड करने की तैयारी चल रही है।</p>
<h2>कैसे करें फ्लाइट सिम्युलेटर का इस्तेमाल ?</h2>
</p>
<p>गूगल फ्लाइट सिम्युलेटर का उपयोग करना बहुत आसान है। इस टूल को इस्तेमाल करने के लिए नीचे बताए गए स्टेप को फॉलो करें :-</p>
</p>
<p>1. अपने सिस्टम पर Google Earth वेबसाइट को ओपन करें।</p>
<p>2. दाईं ओर दिए गए &#8220;Explore Earth&#8221; बटन पर टैप कीजिए।</p>
<p>3. सर्च बार में उस जगह का नाम लिखें, जहां से आप उड़ान भरना चाहते हैं।</p>
<p>4. इसके बाद टूल मेन्यू में जाएं।</p>
<p>5. यहां आपको Flight Simulator को चुनें।</p>
<p>6. इसके बाद आप फ्लाइट का मजा ले पाएंगे।</p>
<h2>कैसे करें फ्लाइट कंट्रोल ?</h2>
</p>
<ul>
<li>फ्लाइट को उड़ाने के लिए माउस या फिर Arrow Keys का इस्तेमाल करिए।</li>
<li>पेज अप बटन दबाने से स्पीड बढ़ेगी और पेज डाउन प्रेस करने से स्पीड घटेगी।</li>
</ul>
<p>आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गूगल अर्थ का फ्लाइट सिम्युलेटर Ace Combat जैसे गेम्स की तरह नहीं है। इसमें मिशन, अचीवमेंट्स या लेवल्स नहीं मिलेंगे। इसे सिर्फ फ्लाइट उड़ाने का एक्सपीरियंस देने के लिए तैयार किया गया है। इसकी खासियत है कि मैप्स का डेटा यूज करता है, जिससे आप दुनिया के लगभग किसी भी हिस्से में वर्चुअल उड़ान भर सकते हैं।</p>
<h2>FAQs</h2>
</p>
<p>1. Google Earth के फ्लाइट सिम्युलेटर टूल को कब लॉन्च किया गया था ?</p>
<p>Ans. गूगल अर्थ के फ्लाइट सिम्युलेटर फंक्शन को साल 2007 में लॉन्च किया गया था।</p>
</p>
<p>2. गूगल अर्थ 3डी मॉडल को कैसे बनाया गया है ?</p>
<p>Ans. गूगल अर्थ में सैटेलाइट इमेज, स्ट्रीट और Aerial फोटो को जोड़कर 3डी मॉडल बनाया गया है।</p>
</p>
<p>3. गूगल ने गूगल अर्थ को कब लॉन्च किया था ?</p>
<p>Ans. टेक जाइंट गूगल ने साल 2005 में गूगल अर्थ को लॉन्च किया था।</p>
]]></content:encoded>
		<media:content url='https://st1.techlusive.in/wp-content/uploads/2026/06/google-8.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='805' >
		</media:content>
		<guid isPermaLink='true'>https://www.techlusive.in/hi/news/google-earth-flight-simulator-release-for-web-users-know-how-to-use-1666023/</guid>
		<link>https://www.techlusive.in/hi/news/google-earth-flight-simulator-release-for-web-users-know-how-to-use-1666023/</link>
		<dc:creator><![CDATA[ajay verma]]></dc:creator>
	 </item>
	 <item>
		<pubDate>Mon, 15 Jun 2026 07:32:49 +0000</pubDate>
		<title><![CDATA[13 अरब प्रकाश वर्ष दूर ब्रह्मांड में मिली खास चीज, वैज्ञानिकों ने किया बड़ा खुलासा]]></title>
		<description>ब्रह्मांड की शुरुआत के सिर्फ 70 करोड़ साल बाद मौजूद एक दूर की आकाशगंगा में वैज्ञानिकों ने तारों को बनाने वाली गैस का विशाल भंडार खोजा है। यह आकाशगंगा पृथ्वी से करीब 13 अरब प्रकाश वर्ष दूर है। इस खोज से शुरुआती ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के तेजी से बनने के रहस्य समझने में मदद मिलेगी। आइए जानते हैं...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ब्रह्मांड की शुरुआत के केवल 70 करोड़ साल बाद मौजूद एक बेहद दूर की आकाशगंगा में वैज्ञानिकों ने तारों के निर्माण के लिए जरूरी गैस का विशाल भंडार खोजा है। इस आकाशगंगा का नाम REBELS-25 है और यह पृथ्वी से करीब 13 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज यह समझने में मदद करेगी कि ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में आकाशगंगाएं इतनी तेजी से कैसे डेवलप हुईं। अब तक इतनी दूर स्थित आकाशगंगाओं में इस तरह की गैस का केवल अनुमान लगाया जाता था, लेकिन पहली बार इसे सीधे तौर पर देखा गया है।</p>
<h2><strong>वैज्ञानिकों ने यह खोज कैसे की?</strong></h2>
</p>
<p>यह अध्ययन जर्नल Monthly Notices of the Royal Astronomical Society में प्रकाशित हुआ है। रिसर्च का नेतृत्व नीदरलैंड की लीडेन यूनिवर्सिटी की Astronomer Karin Öberg ने किया। उनकी टीम ने अमेरिका के NSF Very Large Array (VLA) और चिली स्थित ALMA Observatory का इस्तेमाल करते हुए लगभग 40 घंटे तक REBELS-25 से आने वाले बेहद कमजोर संकेतों की खोज की। वैज्ञानिकों ने Carbon Monoxide Gas के CO(3-2) सिग्नल का पता लगाया, जो अब तक की सबसे दूर स्थित और सबसे पुराने समय की ऐसी खोज मानी जा रही है। इन आंकड़ों के आधार पर रिसर्चर्स ने अनुमान लगाया कि इस आकाशगंगा में लगभग 100 अरब सूर्यों के बराबर Molecular gas मौजूद है।</p>
<h2><strong>95% गैस होने का क्या मतलब है?</strong></h2>
</p>
<p>रिसर्च के अनुसार REBELS-25 का लगभग 95% Mass अभी भी गैस के रूप में मौजूद है। इसका मतलब है कि उस समय यह आकाशगंगा नए तारों के निर्माण के लिए भरपूर ईंधन से भरी हुई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यही वजह हो सकती है कि शुरुआती ब्रह्मांड की कुछ आकाशगंगाएं बहुत कम समय में तेजी से डेवलप हो गईं। यह खोज इस धारणा को मजबूत करती है कि कई नई आकाशगंगाएं अपने शुरुआती दौर में ही विशाल गैस भंडार के साथ मौजूद थीं और लगातार नए तारों का निर्माण कर रही थीं।</p>
<h2><strong>यह खोज विज्ञान के लिए क्यों खास है?</strong></h2>
</p>
<p>हालांकि इतनी दूर स्थित गैस का पता लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण था। इसकी वजह Cosmic Microwave Background (CMB) है, जो बिग बैंग के बाद बची हुई Radiation है और दूर की गैस के संकेतों को कमजोर कर देती है। इसके बावजूद वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक इन संकेतों को रिकॉर्ड किया। आने वाले वर्षों में प्रस्तावित Next-Generation Very Large Array (ngVLA) टेलीस्कोप इस तरह की खोजों को और आसान बनाएगा। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि भविष्य में वे ब्रह्मांड की शुरुआती आकाशगंगाओं का और विस्तार से अध्ययन कर पाएंगे और यह जान सकेंगे कि उन्होंने इतनी तेज गति से डेवलप कैसे किया।</p>
]]></content:encoded>
		<media:content url='https://st1.techlusive.in/wp-content/uploads/2026/06/Star-Forming-Gas.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='805' >
		<media:description type='plain'><![CDATA[Star-Forming Gas]]></media:description>
		</media:content>
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		<dc:creator><![CDATA[Ashutosh Ojha]]></dc:creator>
	 </item>
	 <item>
		<pubDate>Mon, 15 Jun 2026 05:12:19 +0000</pubDate>
		<title><![CDATA[हिंद महासागर की गहराई में मिला रहस्यमयी कब्रिस्तान, वैज्ञानिक भी हुए हैरान]]></title>
		<description>हिंद महासागर की गहराइयों में वैज्ञानिकों को एक ऐसी रहस्यमयी जगह मिली है, जहां बड़ी संख्या में व्हेलों के अवशेष और लाखों साल पुराने Fossils मौजूद हैं। इस इलाके को &#039;Whale Necropolis&#039; कहा जा रहा है। यह खोज समुद्र की गहराइयों में मौजूद अनोखे जीवों, व्हेलों के इतिहास और पृथ्वी के प्राचीन समुद्री जीवन को समझने में अहम साबित हो सकती है। आइए जानते हैं...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पृथ्वी की लगभग 70% सतह महासागरों से ढकी हुई है, लेकिन समुद्र की तलहटी का बड़ा हिस्सा आज भी रहस्यों से भरा हुआ है। हाल ही में वैज्ञानिकों ने हिंद महासागर की गहराइयों में एक ऐसी जगह की खोज की है, जिसे उन्होंने &#8216;Whale Necropolis&#8217; यानी व्हेलों का कब्रिस्तान नाम दिया है। यह खोज Southeastern Indian Ocean के डायमंटिना जोन में हुई है। यहां समुद्र की गहराई में बड़ी संख्या में मृत व्हेलों के अवशेष मिले हैं, जिनके आसपास एक अनोखा समुद्री Ecosystem डेवलप हो चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह दुनिया के सबसे गहरे व्हेल-फॉल इकोसिस्टम में से एक है, जहां मृत व्हेलों के शरीर कई समुद्री जीवों के लिए भोजन का स्रोत बनते हैं।</p>
<h2><strong>मृत व्हेलों के आसपास कौन-कौन से जीव रहते हैं?</strong></h2>
</p>
<p>वैज्ञानिकों के मुताबिक जब कोई व्हेल समुद्र की गहराई में मरकर नीचे डूब जाती है, तो उसका शव कई दशकों तक दूसरे समुद्री जीवों के लिए भोजन का बड़ा स्रोत बना रहता है। इस इलाके में व्हेलों की हड्डियों और अवशेषों पर बड़ी संख्या में ब्रिटल स्टार, हड्डियां खाने वाले कीड़े और क्लैम जैसे जीव मिले हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यहां कुछ ऐसे जीव भी हो सकते हैं, जिन्हें विज्ञान ने पहले कभी नहीं देखा या दर्ज किया है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई जीव शायद खासतौर पर व्हेलों के शवों के आसपास रहने और भोजन पाने के लिए ही डेवलप हुए हैं। यह खोज वैज्ञानिकों को समुद्र की गहराइयों में जीवन कैसे डेवलप होता है, इसे बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगी।</p>
<h2><strong>करोड़ों साल पुराने Whale Fossil क्यों हैं खास?</strong></h2>
</p>
<p>इस खोज की सबसे खास बात सिर्फ हाल में मरी हुई व्हेलों के अवशेष नहीं हैं, बल्कि यहां बड़ी संख्या में बेहद पुराने व्हेल Fossils भी मिले हैं। वैज्ञानिक अब तक 476 व्हेल Fossils की पहचान कर चुके हैं, जिनमें से कुछ करीब 53 लाख साल पुराने हैं। हैरानी की बात यह है कि इन Fossils को खोजने के लिए ज्यादा खुदाई नहीं करनी पड़ी, क्योंकि ये समुद्र की तलहटी पर पत्थरों जैसी आकृतियों में दिखाई दे रहे थे। इसी खोज के दौरान वैज्ञानिकों को व्हेल की एक नई और पहले कभी न देखी गई प्रजाति का Fossils भी मिला, जिसे Pterocetus Diamantinae नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज उन्हें करोड़ों साल पहले समुद्र में रहने वाले जीवों और उनके विकास को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगी।</p>
<h2><strong>यह रहस्यमयी व्हेल कब्रिस्तान कैसे बना होगा?</strong></h2>
</p>
<p>वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज अभी केवल शुरुआत है। अब तक केवल 0.64 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का ही सर्वे किया गया है, जबकि डायमंटिना जोन लगभग 1200 किलोमीटर तक फैला हुआ है। ऐसे में यहां सैकड़ों या हजारों और Fossils छिपे हो सकते हैं। शोधकर्ता अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में व्हेलों के अवशेष एक ही इलाके में कैसे जमा हुए। एक सिद्धांत के अनुसार समुद्री धाराओं और समुद्र की विशेष भौगोलिक बनावट ने व्हेलों के शवों को इस क्षेत्र में पहुंचाकर जमा कर दिया होगा। अगर यह सिद्धांत सही साबित होता है, तो भविष्य में वैज्ञानिक दुनिया के बाकी हिस्सों में भी ऐसे प्राचीन व्हेल कब्रिस्तानों की खोज कर सकते हैं। यह खोज समुद्री जीवन, व्हेलों के विकास और पृथ्वी के प्राचीन इतिहास को समझने में नई जानकारी दे सकती है।</p>
]]></content:encoded>
		<media:content url='https://st1.techlusive.in/wp-content/uploads/2026/06/Whale-Necropolis.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='805' >
		<media:description type='plain'><![CDATA[Whale Necropolis

image credit: Google]]></media:description>
		</media:content>
		<guid isPermaLink='true'>https://www.techlusive.in/hi/news/scientists-discover-hidden-whale-necropolis-in-indian-ocean-5-3-million-year-old-fossils-found-1665921/</guid>
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		<dc:creator><![CDATA[Ashutosh Ojha]]></dc:creator>
	 </item>
	 <item>
		<pubDate>Sun, 14 Jun 2026 08:16:35 +0000</pubDate>
		<title><![CDATA[लॉन्च के कुछ दिन बाद ही बंद हुए Anthropic के ये AI मॉडल, आखिर क्यों?]]></title>
		<description>Anthropic के दो नए AI मॉडल Claude Fable 5 और Claude Mythos 5 लॉन्च के कुछ ही दिनों बाद विवादों में आ गए हैं। अमेरिकी सरकार को चिंता है कि इनकी कुछ क्षमताओं का गलत इस्तेमाल साइबर हमलों और सुरक्षा से जुड़े मामलों में हो सकता है। इसी वजह से दोनों मॉडलों की पहुंच फिलहाल अस्थायी रूप से रोक दी गई है। आइए जानते हैं...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Anthropic की नई AI टेक्नोलॉजी लॉन्च होने के कुछ ही दिनों बाद विवादों में घिर गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सरकार ने कंपनी को अपने दो नए AI मॉडल Claude Fable 5 और Claude Mythos 5 की पहुंच अस्थायी रूप से बंद करने का निर्देश दिया है। सरकार को चिंता है कि इन मॉडलों की कुछ क्षमताओं का गलत इस्तेमाल साइबर हमलों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में किया जा सकता है। Anthropic ने बताया कि उसे 12 जून को यह निर्देश मिला था और उसने इसका पालन करते हुए दोनों मॉडलों की पहुंच रोक दी है। हालांकि कंपनी के बाकी AI मॉडल अभी भी सामान्य रूप से उपलब्ध हैं। इस फैसले ने AI इंडस्ट्री में नई बहस छेड़ दी है कि AI को कितना खुला रखा जाना चाहिए और उन पर कितनी निगरानी होनी चाहिए।</p>
<h2><strong>Claude Mythos 5 और Fable 5 में क्या खास था?</strong></h2>
</p>
<p>Claude Mythos 5 को Anthropic ने साइबर सुरक्षा के लिए बनाया गया अपना सबसे एडवांस AI मॉडल बताया था। कंपनी का कहना था कि यह सॉफ्टवेयर, ऑपरेटिंग सिस्टम और वेब ब्राउजर में छिपी खामियों को बहुत अच्छी तरह पहचान सकता है। इसी वजह से इसे आम लोगों के लिए लॉन्च नहीं किया गया। इसे सिर्फ Project Glasswing नाम के खास प्रोग्राम के तहत कुछ कंपनियों को ही इस्तेमाल करने दिया गया था। इनमें Amazon, Apple, Google, Microsoft और CrowdStrike जैसी बड़ी कंपनियां शामिल थीं। वहीं Claude Fable 5 को Mythos 5 का ऐसा वर्जन माना जा रहा था, जिसे आम यूजर्स के लिए तैयार किया गया था।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="en">The US government, citing national security authorities, has issued an export control directive to suspend all access to Fable 5 and Mythos 5 by any foreign national, whether inside or outside the United States, including foreign national Anthropic employees.</p>
</p>
<p>The net effect of…</p>
</p>
<p>— Anthropic (@AnthropicAI) <a href="https://x.com/AnthropicAI/status/2065597531644743999?ref_src=twsrc%5Etfw" rel="nofollow" target="_blank">June 13, 2026</a></p></blockquote>
<p><script async src="https://platform.x.com/widgets.js" charset="utf-8"></script></p>
<h2><strong>जेलब्रेक टेक्नोलॉजी को लेकर विवाद क्यों हुआ?</strong></h2>
</p>
<p>Anthropic के अनुसार सरकार की चिंता एक ऐसे तरीके को लेकर है, जिससे Claude Fable 5 की कुछ सुरक्षा सीमाओं को पार किया जा सकता था। इसे AI की दुनिया में &#8216;jailbreak&#8217; कहा जाता है। आसान शब्दों में कहें तो jailbreak वह तरीका है, जिसमें कोई व्यक्ति AI को उसकी सुरक्षा नियमों को नजरअंदाज करके ऐसे जवाब देने के लिए उकसाने की कोशिश करता है, जो सामान्य तौर पर उसे नहीं देने चाहिए। कंपनी का कहना है कि कुछ उदाहरणों में यह मॉडल कोड की जांच करके सॉफ्टवेयर की खामियों का पता लगा सकता था। हालांकि Anthropic का दावा है कि ऐसी क्षमता सिर्फ उसके मॉडल में नहीं, बल्कि कई दूसरे AI मॉडलों में भी मौजूद है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अक्सर ऐसे टूल्स का इस्तेमाल सिस्टम की कमियां खोजने और उन्हें ठीक करने के लिए करते हैं। कंपनी ने यह भी कहा कि उसके सबसे जरूरी सुरक्षा सिस्टम अलग से काम करते हैं और किसी भी खतरनाक या गलत जानकारी को रोकने की कोशिश करते रहते हैं।</p>
<h2><strong>Anthropic इस फैसले का विरोध क्यों कर रही है?</strong></h2>
</p>
<p>अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि Mythos 5 जैसी AI अगर गलत लोगों के हाथ लग जाए, तो उसका गलत इस्तेमाल हो सकता है। इसी वजह से दोनों AI मॉडलों की जांच पूरी होने तक उनकी पहुंच अस्थायी रूप से रोक दी गई है। हालांकि Anthropic इस फैसले से सहमत नहीं है। कंपनी का कहना है कि सिर्फ एक सीमित जेलब्रेक मामले के आधार पर किसी AI मॉडल को बंद करना सही नहीं है। Anthropic का तर्क है कि अगर ऐसा नियम सभी AI कंपनियों पर लागू किया गया, तो भविष्य में नए AI मॉडल लॉन्च करना काफी मुश्किल हो जाएगा।</p>
]]></content:encoded>
		<media:content url='https://st1.techlusive.in/wp-content/uploads/2026/02/Anthropic.png' type='image/jpg' expression='full' width='805' >
		<media:description type='plain'><![CDATA[Anthropic has disabled access to Claude Fable 5 and Mythos 5 after a US government order citing security concerns.]]></media:description>
		</media:content>
		<guid isPermaLink='true'>https://www.techlusive.in/hi/news/anthropic-claude-fable-5-and-mythos-5-suspended-after-us-security-concerns-1665865/</guid>
		<link>https://www.techlusive.in/hi/news/anthropic-claude-fable-5-and-mythos-5-suspended-after-us-security-concerns-1665865/</link>
		<dc:creator><![CDATA[Ashutosh Ojha]]></dc:creator>
	 </item>
	 <item>
		<pubDate>Sun, 14 Jun 2026 06:41:43 +0000</pubDate>
		<title><![CDATA[वैज्ञानिकों ने सुलझाया ब्रह्मांड का बड़ा रहस्य, आखिर क्यों खत्म हो गईं शुरुआती समय की बड़ी-बड़ी Galaxies?]]></title>
		<description>ब्रह्मांड के शुरुआती दौर की कई विशाल आकाशगंगाएं बहुत जल्दी Inactive क्यों हो गईं, यह लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य था। अब वैज्ञानिकों ने इसका पता लगाया है। आइए जानते हैं...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Astronomers ने ब्रह्मांड के शुरुआती समय से जुड़े एक बड़े रहस्य का जवाब खोजने का दावा किया है। वैज्ञानिक लंबे समय से यह जानना चाहते थे कि बिग बैंग के बाद बनी कुछ विशाल आकाशगंगाएं इतनी जल्दी Inactive क्यों हो गईं। आमतौर पर शुरुआती ब्रह्मांड की आकाशगंगाओं में बड़ी संख्या में नए तारे बनने चाहिए थे, लेकिन कई बड़ी आकाशगंगाओं में यह प्रक्रिया दो अरब साल से भी कम समय में लगभग रुक गई। अब वैज्ञानिकों को लगता है कि उन्हें इसकी वजह मिल गई है। James Webb Space Telescope (JWST) और Atacama Large Millimeter/submillimeter Array (ALMA) की मदद से रिसर्चर्स ने एक बेहद शक्तिशाली गैसीय हवा का पता लगाया है, जिसे &#8216;Galaxy Killer Wind&#8217; कहा जा रहा है। यह आकाशगंगा के भीतर मौजूद गैस को बाहर निकाल देती है और नए तारों के बनने की प्रक्रिया को रोक देती है।</p>
<h2><strong>CRISTAL-02 में वैज्ञानिकों ने कौन-सी बड़ी खोज की?</strong></h2>
</p>
<p>यह रिसर्च 10 जून को Monthly Notices of the Royal Astronomical Society जर्नल में प्रकाशित हुआ है। Swinburne University of Technology की वैज्ञानिक रेबेका डेविस और उनकी टीम ने CRISTAL-02 नाम की एक Milky Way System का अध्ययन किया। यह सिस्टम हमें उस समय की दिखाई देती है जब बिग बैंग के सिर्फ 1.1 अरब साल ही बीते थे। दरअसल, यह दो आकाशगंगाओं के आपस में टकराकर एक बनने की प्रक्रिया में है। JWST और ALMA से मिले डेटा के एनालिसिस में वैज्ञानिकों ने पाया कि इस आकाशगंगा से ठंडी गैस का एक बहुत बड़ा बादल तेजी से बाहर निकल रहा है। यह गैस करीब 640 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से बाहर जा रही है, जो वहां नए तारों के बनने की गति से लगभग दोगुनी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर गैस इसी तरह बाहर निकलती रही, तो नए तारे बनाने के लिए जरूरी ईंधन 10 करोड़ साल से भी कम समय में खत्म हो सकता है। इसके बाद आकाशगंगा में नए तारों का बनना लगभग रुक जाएगा।</p>
<h2><strong>आकाशगंगा से गैस बाहर निकालने के लिए कौन जिम्मेदार है?</strong></h2>
</p>
<p>रिसर्च में सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि इस तेज गैसीय हवा के पीछे कोई विशाल ब्लैक होल नहीं, बल्कि सुपरनोवा विस्फोट हैं। सुपरनोवा तब होता है जब किसी बड़े तारे का जीवन खत्म होने पर उसमें जोरदार विस्फोट होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जब दो आकाशगंगाएं आपस में टकराती हैं तो वहां बहुत तेजी से नए तारे बनने लगते हैं। CRISTAL-02 में भी सामान्य से लगभग तीन गुना ज्यादा तेजी से तारे बन रहे थे। इन नए बने बड़े तारों के जीवन के अंत में हुए शक्तिशाली सुपरनोवा विस्फोटों ने इतनी एनर्जी पैदा की कि उन्होंने आकाशगंगा के अंदर मौजूद गैस को बाहर धकेलना शुरू कर दिया। यही गैस नए तारों के बनने के लिए जरूरी होती है। जब गैस कम होने लगती है, तो नए तारे बनना भी रुक जाता है और धीरे-धीरे पूरी आकाशगंगा Inactive हो जाती है।</p>
<h2><strong>क्या यही प्रक्रिया इन सब का कारण बनी?</strong></h2>
</p>
<p>वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में ऐसी घटनाएं काफी आम रही होंगी। रिसर्च के मुताबिक उस समय मौजूद लगभग आधी बड़ी आकाशगंगाएं किसी न किसी दूसरी आकाशगंगा के साथ टकराने या विलय होने की प्रक्रिया से गुजर रही थीं। अगर ऐसी तेज गैसीय हवाएं दूसरी आकाशगंगाओं में भी मौजूद थीं, तो यही वजह हो सकती है कि कई विशाल आकाशगंगाओं में नए तारे बहुत जल्दी बनना बंद हो गए और वे समय से पहले Inactive हो गईं। यह खोज वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करेगी कि आकाशगंगाएं समय के साथ कैसे डेवलप होती हैं और शुरुआती ब्रह्मांड में तारे बनने और खत्म होने की प्रक्रिया कैसे काम करती थी। शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में JWST और ALMA जैसे शक्तिशाली टेलीस्कोप की मदद से ऐसे और उदाहरण खोजे जा सकते हैं। इससे ब्रह्मांड के शुरुआती इतिहास और उसके विकास को और बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।</p>
]]></content:encoded>
		<media:content url='https://st1.techlusive.in/wp-content/uploads/2026/06/Galaxies.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='805' >
		<media:description type='plain'><![CDATA[Galaxies]]></media:description>
		</media:content>
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		<dc:creator><![CDATA[Ashutosh Ojha]]></dc:creator>
	 </item>
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